Vijay Diwas 1971 के युद्ध में दून के कुकरेती परिवार के पांच भाइयों ने एक साथ भाग लिया, जिनमें से तीन राजपूत रेजिमेंट और दो ईएमई कोर में थे। अलग-अलग मोर्चों पर वीरता दिखाते हुए, उन्होंने भारत की विजय में योगदान दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती, शौर्य चक्र विजेता, उन साहसी सैनिकों में से थे। परिवार की विरासत को ‘कहानी 1971 युद्ध की’ पुस्तक में सहेजा गया है।
Vijay Diwas 16 दिसंबर 1971… यह वह ऐतिहासिक दिन था, जब भारत ने पाकिस्तान को निर्णायक रूप से परास्त कर विश्व मंच पर अपनी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया और विजय पताका फहराई।
इस गौरवशाली जीत की गूंज आज भी दून की डिफेंस कालोनी में बसे कुकरेती परिवार के घर से सुनाई देती है। यह वही परिवार है, जहां एक नहीं बल्कि पांच भाइयों ने एक साथ 1971 के भारत-पाक युद्ध में भाग लेकर अद्वितीय मिसाल कायम की।
शौर्य चक्र विजेता रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती उन विरले और साहसी सैनिकों में शामिल हैं, जिनके साथ उनके चारों भाई भी युद्ध के विभिन्न मोर्चों पर डटे रहे। तीन भाई राजपूत रेजिमेंट और दो भाई ईएमई कोर में तैनात थे। भले ही उनकी यूनिट और मोर्चे अलग-अलग थे, लेकिन लक्ष्य एक ही था दुश्मन को परास्त कर भारत को विजय दिलाना।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल कुकरेती बताते हैं कि नवंबर 1971 के अंतिम दिनों में ही युद्ध की आहट महसूस होने लगी थी। पाकिस्तानी सेना भारतीय फौज की रसद लाइनों को ध्वस्त कर आगे बढ़ने से रोकना चाहती थी, लेकिन भारतीय जवानों ने हर साजिश को नाकाम कर दिया।
धर्मनगर से लेकर गाजीपुर तक दुश्मन के इलाके में घुसकर की गई रेकी ने युद्ध की दिशा तय कर दी। गाजीपुर अभियान की यादें आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। तीन दिन तक बिना अन्न-जल, करीब 93 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा, चारों ओर गिरते गोले और लगातार खतरे के बीच भारतीय जवान अडिग रहे।
भारी नुकसान के बावजूद सेना ने फिर से मोर्चा संभाला और अगले ही हमले में पाकिस्तानी फौज को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद हिलाई चारा, फेंचु गंज और सिलहट में भारतीय सेना ने ऐसा पराक्रम दिखाया कि दुश्मन के हौसले पस्त हो गए।
सिलहट में भारतीय वायुसेना और थलसेना की संयुक्त कार्रवाई के सामने पाकिस्तानी टुकड़ियां टिक नहीं सकीं और सैकड़ों सैनिकों ने हथियार डाल दिए। कुकरेती परिवार के चार वीर सपूत मेजर जगदीश प्रसाद कुकरेती, मेजर जनरल पीएल कुकरेती, नायब सूबेदार सोहनलाल कुकरेती और मेजर धर्मलाल कुकरेती आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शौर्यगाथा अमर है।
इस अमूल्य विरासत को परिवार की बहू इरा कुकरेती ने ‘कहानी 1971 युद्ध की’ पुस्तक के माध्यम से सहेजा है। विजय दिवस पर कुकरेती परिवार की यह प्रेरक गाथा न केवल इतिहास को जीवंत करती है, बल्कि हर युवा के भीतर देशभक्ति, त्याग और समर्पण की ज्वाला भी प्रज्वलित करती है।
इस गौरवशाली परिवार को अब तक चार प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। परिवार के वरिष्ठ सदस्य मेजर जनरल प्रेम लाल कुकरेती को सेना मेडल से सम्मानित किया गया। अदम्य साहस और रणकौशल का परिचय देने पर लेफ्टिनेंट कर्नल आरसी कुकरेती को शौर्य चक्र प्रदान मिला।
देशसेवा की यही परंपरा अगली पीढ़ी में भी कायम रही, जहां उनके पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल कार्तिकेय कुकरेती को सेना मेडल से अलंकृत किया गया, जबकि दूसरे पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल अर्थ कुकरेती को मेंशन इन डिस्पैच से सम्मानित किया गया।
Phoneclubcasino’s not bad! Seems to have a good selection of games and is optimized for mobile which is a must. Check out for yourself phoneclubcasino.
Desk game casino, just like the name suggests gets the games rolling. I like the selection and find it user friendly. Check out desk game casino desk game casino.
Buenasph has a really modern feel. It runs better than expected. Definitely recommended. Check out my go to place buenasph.